तूफानी मारधाड़, आयटम साँग, भ्रष्ट मंत्री या पुलीस, इस तरह की कहानियाँ दिखानेवाली अनेक मसाला फिल्मों में से एक है, रॉबिन भट एवं संजय गुप्ताद्वारा लिखीत, "मुंबई सॅगा..."
गँगस्टर अमर नाईक के एन्काऊंटर की घटनापर आधारीत, "मुंबई सॅगा" यह फिल्म, मिल से लेकर मॉल तक होनेवाले मुंबई के बदलाव पर रौशनी डालती है | फिल्म की कहानी आम कहानियों की तरह ही है | अन्याय के खिलाफ खड़ा रहनेवाला हिरो अमरत्य राव (जॉन एब्राहम), भाऊ (महेश मांजरेकर) नाम के बड़े राजनितिज्ञ की मदद से कुछ दिन में ही बड़ा गँगस्टर बनता है | अमरत्य राव जब काबू से बाहर होने लगता है, तब उसे रोकने का जिम्मा इंस्पेक्टर विजय सावरकर (इम्रान हाश्मी) अपने सिर पर लेता है और अखिर एन्काऊंटर में विजय अमरत्य को मार गिराता है |
फिल्म के सभी पात्र अगर देखें, तो ८० एवं ९० के दशक के मशहूर व्यक्तियों की, अर्थात अमर नाईक, छोटा राजन, हाजी मस्तान, एन्काऊंटर स्पेशालिस्ट विजय साळसकर और बाळासाहेब ठाकरे की याद आती है | पूरी फिल्म अगर देखी जाए, तो कहानी दो भागों में बटी हुई है | पहला भाग, मेकिंग और राईज ऑफ अमरत्य राव दर्शाता है, तो दूसरे भाग में राईज ऑफ विजय सावरकर के साथ विजय आणि अमरत्य के बीच के चूहे-बिल्लीवाला खेल देखने को मिलता है |
गुलशन ग्रोव्हर, महेश मांजरेकर, समीर सोनी, रोनीत रॉय इन कलाकारों ने उनके हिस्से की भूमिकाएँ बखूबी निभाईं हैं | प्रतीक बब्बर अपने किरदार को निभाने में थोड़े से कमजोर दिखे | उनकी डायलॉग डिलिवरी, एक्सप्रेशन्स, बाकी कलाकारों की तुलना में उतने उभरकर नहीं आये | Standout performance की अगर बात करें, तो काजल अगरवाल ने अच्छा काम किया है | सीमा राव के किरदार में उन्होंने जैसे जान फूँक दी है | सीमा राव का किरदार, "सिंघम" फिल्म के 'काव्या' की याद दिलाता है | फिल्म की दूसरी अच्छी बात थी, इम्रान हाश्मी का performance...
"चॉकलेट" और "बादशाहो" जैसी फिल्मों के कई अरसे बाद इम्रान हाश्मी के पास ऐसा कोई डॅशिंग रोल आया है | हाला कि उनका रोल इंटरवल के बाद ही शुरू हुआ, लेकिन उन्हें जितने सीन मिले थे, इम्रान हाश्मी ने उन्हें अच्छे से निभाया है | फिल्म में एक सीन है जहाँ विजय और अमरत्य के बीच फाईट होती है | वह सीन थोड़ा अटपटासा लगा | जॉन एब्राहम जैसे शारिरीक तौरपर सुदृढ़ इंसान के साथ इम्रान हाश्मी फाईट करे, यह बात कुछ जमी नहीं | यह सीन अगर ना होता तो शायद उन दोनों के बीच की लड़ाई और realistic लगती | उनके बीच जो आखरी action sequence फिल्माया गया, वह कुछ हद तक ठिक था |
फिल्म के नायक की बात करें, तो जॉन एब्राहम ने अपने किरदार को ठिक से निभाया है | क्या यह उनका outstanding performance था... तो मैं कहूँगा नहीं | इससे पहले भी "ऐतबार", "शूट आऊट अॅट वडाला", "सत्यमेव जयते", ऐसी फिल्मों में जॉन एब्राहमने इस किस्म के किरदार निभाएँ थे, फर्क था तो सिर्फ कहानी, जगह और नाम का | "ऐतबार" में हाला कि उनका निगेटिव्ह किरदार था, लेकिन बाकी दोनों फिल्मों में जॉन एब्राहम की भूमिकाएँ अमरत्य राव के किरदार से करीब करीब मिलती-जुलती थी |
फिल्म का बॅकग्राऊंड स्कोर अमर मोहिलेजी ने दिया है, जो कहानी को रोमहर्षक बनाने में काफी हद तक मदद करता है | फिल्म में दो ही गाने हैं, 'डंका बजा...' और 'शोर मचेगा...' | दोनों गानों के बीट्स अच्छे हैं और दोनों ही कहानी के साथ चलते हैं | पर यह गाने ऐसे नहीं, जो हम हर वक्त गुनगुनाएँ | फिल्म के संवाद काफी जोश भरे हैं किरदारों को उभारने में उनकी बड़ी मदद होती है | संक्षेप में कहा जाए, तो मुंबई में घटी एक-दो घटनाओं का आधार लेकर एक फिल्म बनी, जो आम मसाला फिल्मों की तरह पेश की गई | इसमें सच कितना और मसाला कितना, यह तो वहीं बता सकते हैं जो उस वक्त मौजूद थे | लेकिन, जॉन एब्राहम के फॅन्स के लिये संजय गुप्ता निर्देशित "मुंबई सॅगा", दोन घंटों का सुहाना सफर है यह कहना गलत नहीं होगा |
@ अनिकेत परशुराम आपटे.
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